(Feature Image: Natural vegetation in the Yamuna floodplain is being damaged during the levelling of land at the Yamuna Reservoir Project, developed over 17 acres near Sungarpur village in Delhi’s Burari area in 2019. Bhim Singh Rawat, Aug. 23, 2026)
इसमें कोई संदेह नहीं है कि दिल्ली में यमुना के बाढ़ क्षेत्र (खादर) में बढ़ते अतिक्रमण ने प्राकृतिक बाढ़ को आपदा में बदलने का खतरा पैदा कर दिया है। खादर क्षेत्र का सीमांगन नहीं होने के कारण ओ-ज़ोन (यमुना खादर) का सही तरह से क्रियान्वयन नहीं हो रहा है।
लेकिन वर्तमान बहस समस्या के केवल एक हिस्से तक सीमित है, जबकि इसके मूल कारणों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यमुना के खादर पर किस प्रकार के अतिक्रमण हुए हैं और इसकी सुरक्षा के लिए कौन-सा कानूनी एवं संस्थागत ढांचा उपलब्ध है।
बड़े निर्माण परियोजना से पटा यमुना खादर: दिल्ली में यमुना का मात्र 22 किलोमीटर लंबे हिस्से में 25 पुल और तीन बैराज बने हुए हैं। इतनी अधिक संरचनाएं नदी के लगभग 300 किलोमीटर लंबे ऊपरी और निचले हिस्से में भी नहीं मिलतीं हैं। इसके अलावा कामनवेल्थ गेम्स विलेज, अक्षरधाम मंदिर, मेट्रो डिपो और अन्य सरकारी परियोजनाओं ने बाढ़ क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। इन संरचनाओं ने यमुना खादर को कई हिस्सों में बांट दिया है। नदी और बाढ़ क्षेत्र के बीच प्राकृतिक संपर्क बाधित कर दिया है। इससे बाढ़ के पानी को समाहित करने और सुरक्षित रूप से बहाने की क्षमता भी कम हुई है।
दिल्ली में नदी पर बने तीन बैराजों वज़ीराबाद, इंद्रप्रस्थ (आईटीओ),ओखला ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को भी प्रभावित किया है। इनका संचालन आज भी अपारदर्शी है। तीनों बैराज तीन अलग राज्य सरकारों दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश के अधीन हैं। विशेषकर बाढ़ के दौरान इनके समन्वित संचालन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
जुलाई 2023 और सितंबर 2025 की बाढ़ ने इन कमजोरियों को उजागर किया। इसके बावजूद पुलों और बैराजों की समीक्षा, उनकी जल निकासी क्षमता बढ़ाने, बैराज संचालन को पारदर्शी बनाने तथा सरकारी परियोजनाओं से उत्पन्न अवरोधों को दूर करने पर केंद्रीय जल आयोग समेत इन राज्य सरकारों द्वारा गंभीर चर्चा एवं प्रयास नहीं हुए हैं।
यमुना खादर अतिक्रमण: यमुना खादर पर हुए अतिक्रमणों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों निजी और सार्वजनिक में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में पुराने गांव, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां (JJ क्लस्टर) और अनधिकृत कॉलोनियां आती हैं, जहां किसान, मछुआरे और नाविक जैसे पारंपरिक नदी-आधारित समुदाय वर्षों से मौसमी खेती और अस्थायी आवासों के साथ बाढ़ के अनुरूप जीवन जीते आए हैं। उनका नदी से संबंध स्थायी कंक्रीट निर्माणों से बिल्कुल अलग है।
गढ़ी मांडू, उस्मानपुर तथा गणेश नगर, पांडव नगर और चिल्ला खादर से जुड़े कई गांव और उनके अस्थायी आवास तटबंध बनने के बाद उनके भीतर फंस गए। इससे उन पर बाढ़ का प्रभाव पहले से अधिक होने लगा।
इसके अतिरिक्त, नियोजित शहरी विकास, किफायती आवास और प्रभावी शासन के अभाव में बड़ी संख्या में प्रवासी लोग भी बाढ़ के खतरे के बावजूद खादर में बनी अनिधिकृत कॉलोनियों में बसने को मजबूर हुए हैं। तटबंधों के निर्माण ने उन्हें यह भ्रम दिया कि यह क्षेत्र अब सुरक्षित है।
दूसरी श्रेणी में सरकार द्वारा समर्थित स्थायी निर्माण आते हैं। इनमें सड़कें, पुल, बैराज, तटबंध, बिजलीघर, स्मारक, संस्थागत परिसर, व्यावसायिक परियोजनाएं और सौंदर्यीकरण योजनाएं शामिल हैं।
वर्षों से झुग्गी बस्तियों और नदी किनारे रहने वाले किसानों के अस्थायी ढांचों को अतिक्रमण बताकर हटाया जाता रहा है। वहीं दूसरी ओर, बड़े स्थायी निर्माणों को उसी खादर में अनुमति मिलती रही। वास्तविक समस्या केवल अतिक्रमण नहीं अनियोजित विकास, कमजोर शासन व्यवस्था तथा मौजूदा नियोजन प्रावधानों और न्यायिक आदेशों का चुनिंदा एवं कमजोर पालन है। यही कारण हैं जिनसे यमुना खादर लगातार सिकुड़ता, खंडित और शहरीकरण का शिकार होता जा रहा है।
खादर संरक्षण में कानूनी और संस्थागत कमियां: दिल्ली में यमुना खादरसंरक्षण में तीन कानूनी और संस्थागत कमियां हैं।पहला, भारत में आज भी ऐसा कोई समर्पित वैधानिक कानून नहीं है जो नदी तल और फ्लडप्लेन की वैज्ञानिक पहचान, सीमांकन और संरक्षण सुनिश्चित करे। इस कमी को दूर करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2011 में रिवर रेगुलेशन ज़ोन का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक मानचित्रण और भूमि उपयोग नियंत्रण के माध्यम से नदी खादर की रक्षा करना था। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यह अधिसूचित नहीं हो सका।
दूसरा, दिल्ली मास्टर प्लान (MPD) ने वर्ष 2001 में यमुना और उसके खादर को ओ-ज़ोन घोषित कर वैधानिक सुरक्षा प्रदान की। लेकिन खादर के वैज्ञानिक मानचित्रण, भौतिक सीमांकन और ज़ोन-ओ के प्रविधानों का ईमानदारी से क्रियान्वयन न होने के कारण इसका प्रभाव काफी कमजोर रहा है। दूसरी ओर, विभिन्न सरकारों ने खादर में स्थित अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने के प्रयास भी किए, जिससे ओ-जोन की मूल भावना लगातार कमजोर होती गई।
तीसरा, दिल्ली में ऐसा कोई स्वतंत्र संस्थान नहीं है जो केवल यमुना खादर के प्रबंधन और संरक्षण के लिए उत्तरदायी हो। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), दिल्ली सरकार, राजस्व विभाग, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग और नगर निकाय सभी इस क्षेत्र में अधिकार रखते हैं। लेकिन जिम्मेदारी बंटी हुई है और जवाबदेही किसी एक संस्था की नहीं है।
विडंबना यह है कि स्वयं डीडीए ने खादर में रिवरफ्रंट परियोजनाओं, सुंदरीकरण पार्कों, निर्माण सुविधाओं, कास्टिंग यार्डों और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं को अनुमति दी या बढ़ावा दिया। सरकारी परियोजनाओं को अक्सर उन्हीं नियोजन प्रविधानों से छूट मिलती रही, जिनका उद्देश्य खादर की रक्षा करना था। यही कारण है कि ओ-जोन कागज़ों में अधिक प्रभावी दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर उसका प्रभाव बहुत सीमित है।
न्यायिक हस्तक्षेप, लेकिन अधूरा क्रियान्वयनः राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कई बार यमुना फ्लडप्लेन के पारिस्थितिक महत्व को स्वीकार किया है।जनवरी 2015 के ऐतिहासिक “मैली से निर्मल यमुना” निर्णय में, मनोज मिश्रा और यमुना जिए अभियान के निरंतर प्रयासों के बाद, एनजीटी ने सभी एजेंसियों को खादर की रक्षा करने और नदी की बाढ़ वहन क्षमता कम करने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया।
जुलाई 2023 की बाढ़ के बाद एनजीटी ने दिल्ली सरकार को यमुना के 100 वर्षीय बाढ़ क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण करने और उसका भौतिक सीमांकन करने का निर्देश दिया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि तटबंधों को प्राकृतिक खादर की सीमा नहीं माना जा सकता। हालांकि GIS आधारित मानचित्रण में प्रगति हुई है, लेकिन विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण भौतिक सीमांकन अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।
आगे का रास्ता: दिल्ली को वैज्ञानिक मानचित्रण, भौतिक सीमांकन और एक स्वतंत्र खादर प्रबंधन संस्था पर आधारित कानूनी रूप से प्रभावी संरक्षण व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। ज़ोन-ओ को केवल कागज़ों में नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से लागू किया जाना चाहिए। जब तक वैज्ञानिक सीमांकन पूरा नहीं होगा, तब तक ज़ोन-ओ का प्रभावी क्रियान्वयन और खादर का दीर्घकालिक संरक्षण संभव नहीं होगा।
भविष्य की योजनाओं में पारंपरिक नदी-आधारित समुदायों और सीमेंट-कंक्रीट के बड़े स्थायी निर्माणों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। सरकारी परियोजनाओं पर भी वही नियम लागू होने चाहिए जो निजी अतिक्रमणों पर लागू होते हैं। पुलों, बैराजों और तटबंधों के बाढ़ पर पड़ने वाले प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए तथा बैराजों का संचालन पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
यमुना खादर का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि दिल्ली की बाढ़ सुरक्षा, जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन की अनिवार्य शर्त है। आज खादर का जो भी हिस्सा नष्ट होगा, उसकी कीमत भविष्य में दिल्ली को कहीं अधिक सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक नुकसान के रूप में चुकानी पड़ेगी।
भीम सिंह रावत SANDRP
इस लेख का एक संपादित संस्करण 13 अगस्त 2026 को दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है।
