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शौचालयी स्वच्छता से संपूर्ण शुचिता की ओर-2 (जल-थल-मल पुस्तक सारांश)

आज गॉधी जंयती है और स्व्च्छ भारत अभियान को भी दो वर्ष पूरे हो गए हैं। दो दिन पूर्व, 30 सितम्बर को इंडोसैन समारोह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छाग्रह चलाने का मंत्र किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत आयोजित इस समारोह में उन्होंने सीमित संदर्भ में ही सही दो ओर बड़ी अच्छी बातें कहीं, एक स्वच्छता को लेकर हमें अपने आचरण में बदलाव लाना चाहिए और दूसरा जैविक कूडे़ कचरे से खाद बनायी जा सकती है। दूसरी ओर शहरी विकास मंत्री वैंकया नायडू के अनुसार देश में 1 लाख से ज्यादा गॉव खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं।

भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने भी एक बार कहा था कि जब तक भारत में सब लोगों के पास शौचालय सुविधा उपलब्ध नहीं होती, वो तब तक भारत को आज़ाद नहीं मानेगे। इसी प्रंसग में राष्ट्रपिता महात्मा गॉधी जी का भी जिक्र अनायास हो आता है जिंहोने सैनिटेशन को आजादी से भी बढ़कर बताया और मैला प्रथा के विरोध में सब मानवों को अपने मैले का निपटान खुद करने के लिए भी कहा।

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शौचालय निर्माण से शुचिता की ओर-1 (जल-थल-मल पुस्तक समीक्षा)

खुले में शौच की आदत से निजात दिलाने के लिए केन्द्र सरकार शौचालय बनाने का काम 1980 के दशक से लेकर अब तक चलाती आ रही है। 1999 में इस अभियान का नाम टोटल सैनिटेशन कैंपेन और 2013 में निर्मल भारत अभियान हो गया। आज इसे स्वच्छ भारत अभियान के नाम से जाना जाता है। बदले नाम के साथ हाल में स्वच्छ भारत मिशन भी 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा उठाए हुए है। ऐसा करने वाले गाॅवों का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिया जा रहा है। 2003 से लेकर अबतक करीब 28 हजार से ज्यादा गाॅवों को इस ईनाम से नवाजा जा चुका है।

सरकारी आॅकड़ो के मुताबिक देश में 10 में से 3 व्यक्ति आज भी खुले में ही शौच जाते हैं। जो सरकार के लिए अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी शर्मिंदगी का विषय है। सयुक्त राष्ट्र के अनुसार गरीबी में भारत से निचले पायदानों पर खडे़ देश नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि पडौसी मुल्क शौचालय बनाने में भारत से कहीं आगे निकल गए हैं।

केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार इस अभियान के तहत अब तक 8 करोड़ 7 लाख शौचालय बनाए गए हैं। यानी 12 करोड़ 5 लाख शौचालयों के लक्ष्य का 70 फीसदी बन चुके हैं। परंतु 2011 की जनगणना के हिसाब से महज 5 करोड़ 16 लाख शौचालय ही पाए गए। मामला साफ है शौचालय ज़मी पर कम और कागज़ों में ज्यादा बने। 2008 के सर्वे में बड़ा खुलासा हुआ की 132 निर्मल गाॅव ईनाम पाने वाले में से केवल 6 गाॅव ऐसे निकले जिनमें कोई भी खुले में पखाना नहीं जाता था। योजना आयोग द्वारा तैयार 2013 की रपट इससे अधिक दिलचस्प है जो बताती है 73 फीसदी शौचालयवाले घरों में अब भी कम से कम एक सदस्य खुले में ही शौच जाता है।

इन सब के बीच प्रश्न उठता है, क्या शौचालय बनाना ही सैनिटेशन है और क्या मात्र शौचालय बनाने से ही भारत स्वच्छ हो जाएगा ? कहीं शौच मुक्त भारत के लक्ष्य का पीछा करते हम लोग प्राकृतिक संसाधनों का नाजायज दोहन और प्रदूषण तो नहीं कर रहे हैं ? मानव मल का प्रकृति और माटी से क्या संबंध है ? कहीं मात्र शौचालयी स्वच्छता के कारण ही तो पानी की बर्बादी और नदियों का प्रदूषण नहीं बढ़ रहा है? मल के जल और थल से बिखरे संबंधों से फिर रूबरू कराते हुए इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशती है, सोपान जोशी द्वारा लिखित जल-थल और मल पुस्तक!

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