DRP News Bulletin

DRP News Bulletin 25 February 2019: Listen, Climate Bonds Initiative: Big Hydro is NOT climate solution

As about 500 global financiers meet in London on March 5-7, 2019, one of the items on agenda pushed by Big Hydro lobby is criteria to include Big Hydro as climate solution. As following Comment in Nature shows, this is completely based on lobbying efforts and not based on merit of the case. If the merits of large hydro were to looked at objectively, there is absolutely no case of inclusion of Large Hydro as climate solution. In fact, the article does not attempt to list the severe, widespread and long lasting adverse social and environmental impacts of large hydro. Today when there is BIG question mark over even economic viability of large hydro, such attempts are clearly uncalled for. Hope the global financiers will see through this lobbying effort. 

The World Hydropower Congress will meet in Paris during May 14-16, 2019. Their program says:

Following over two years of discussions with industry, academia, governments and international NGOs, the Climate Bonds Initiative, an investor-focused not-for-profit is due to launch a consultation later this year on proposed green bond criteria for hydropower. This criteria is seen as key to fully unlocking the market to the hydropower sector, as to date it has been held back a lack of clarity over appropriate standards. https://congress.hydropower.org/2019-paris/programme/green-bonds-for-hydropower/

This shows that the Congress, essentially a Hydropower Lobby meeting, is also interconnected with the Climate Bond Initiative on Hydropower. 

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Dams

शौचालय निर्माण से शुचिता की ओर-1 (जल-थल-मल पुस्तक समीक्षा)

खुले में शौच की आदत से निजात दिलाने के लिए केन्द्र सरकार शौचालय बनाने का काम 1980 के दशक से लेकर अब तक चलाती आ रही है। 1999 में इस अभियान का नाम टोटल सैनिटेशन कैंपेन और 2013 में निर्मल भारत अभियान हो गया। आज इसे स्वच्छ भारत अभियान के नाम से जाना जाता है। बदले नाम के साथ हाल में स्वच्छ भारत मिशन भी 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त कराने का बीड़ा उठाए हुए है। ऐसा करने वाले गाॅवों का निर्मल ग्राम पुरस्कार भी दिया जा रहा है। 2003 से लेकर अबतक करीब 28 हजार से ज्यादा गाॅवों को इस ईनाम से नवाजा जा चुका है।

सरकारी आॅकड़ो के मुताबिक देश में 10 में से 3 व्यक्ति आज भी खुले में ही शौच जाते हैं। जो सरकार के लिए अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी शर्मिंदगी का विषय है। सयुक्त राष्ट्र के अनुसार गरीबी में भारत से निचले पायदानों पर खडे़ देश नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि पडौसी मुल्क शौचालय बनाने में भारत से कहीं आगे निकल गए हैं।

केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के अनुसार इस अभियान के तहत अब तक 8 करोड़ 7 लाख शौचालय बनाए गए हैं। यानी 12 करोड़ 5 लाख शौचालयों के लक्ष्य का 70 फीसदी बन चुके हैं। परंतु 2011 की जनगणना के हिसाब से महज 5 करोड़ 16 लाख शौचालय ही पाए गए। मामला साफ है शौचालय ज़मी पर कम और कागज़ों में ज्यादा बने। 2008 के सर्वे में बड़ा खुलासा हुआ की 132 निर्मल गाॅव ईनाम पाने वाले में से केवल 6 गाॅव ऐसे निकले जिनमें कोई भी खुले में पखाना नहीं जाता था। योजना आयोग द्वारा तैयार 2013 की रपट इससे अधिक दिलचस्प है जो बताती है 73 फीसदी शौचालयवाले घरों में अब भी कम से कम एक सदस्य खुले में ही शौच जाता है।

इन सब के बीच प्रश्न उठता है, क्या शौचालय बनाना ही सैनिटेशन है और क्या मात्र शौचालय बनाने से ही भारत स्वच्छ हो जाएगा ? कहीं शौच मुक्त भारत के लक्ष्य का पीछा करते हम लोग प्राकृतिक संसाधनों का नाजायज दोहन और प्रदूषण तो नहीं कर रहे हैं ? मानव मल का प्रकृति और माटी से क्या संबंध है ? कहीं मात्र शौचालयी स्वच्छता के कारण ही तो पानी की बर्बादी और नदियों का प्रदूषण नहीं बढ़ रहा है? मल के जल और थल से बिखरे संबंधों से फिर रूबरू कराते हुए इन्हीं सब सवालों का जवाब तलाशती है, सोपान जोशी द्वारा लिखित जल-थल और मल पुस्तक!

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